

गौतम बुद्ध का जमाना था। तब स्वतंत्र पशु – चिकित्सालय नहीं था।
तत्समय के मशहूर चिकित्सक जीवक थे। राजगीर में उनका चिकित्सालय था।
अब भरहुत स्तूप पर उकेरे गए जीवक के अस्पताल का दृश्य देखिए। ( चित्र 1)
चिकित्सालय में औषधियाँ सिकहर ( छींका ) पर टँगी हुई हैं। जीवक पेट का इलाज कर रहे हैं। संबंधित औषधियाँ सिलबट्टे से पीसी जा रही हैं।
चिकित्सालय में बीमार पशु भी हैं। कराहते बीमार पशुओं का अंकन बड़ा मार्मिक है।
फिर सम्राट अशोक का जमाना आया। सम्राट अशोक ने पशु चिकित्सालय को मनुष्यों के चिकित्सालय से अलग किए।
दूसरे शिलालेख में लिखवाए कि मनुष्य चिकित्सा और पशु चिकित्सा मैंने दो चिकित्साओं को अलग-अलग स्थापित किए।
लाल घेरे में प्राकृत भाषा और धम्म लिपि में लिखा है — मनुस चिकीछा च पसु चिकीछा। ( चित्र 2 )
भारत के इतिहास में स्वतंत्र पशु चिकित्सालय खोलने का श्रेय सम्राट अशोक को है।
Article by Rajendra Sinh